Saturday, August 27, 2011

दर्द सा होता है

काश दर्द को कोई
नाम दे पाता
तो जरूर दे देता
ये दर्द है या
मेरे होने का सिला
आज तक
समझ नहीं पाया
बस कहीं
कुछ चुभता है,
दर्द सा होता है.
क्यों पता नहीं
कहाँ ये भी
नहीं पता
कभी टेसुओं
सा बहता है
कभी अंगार
सा जलता है.
ज्वार सा
उठता है
सागर सा फैल
अणु सा
सिमट जाता है
बस कहीं
कुछ चुभता है,
दर्द सा होता है.

(आशुतोष पाण्डेय)

3 comments:

वन्दना said...

वाह आज तो दर्द को परिभाषित कर दिया…………बेहतरीन प्रस्तुति।

Kailash C Sharma said...

बहुत खूब! बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति..

anu said...

dard ne dard ko paribhashit kar diya bahut khub